वृन्दावन वास कर रज में विश्राम भला - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (88)

वृन्दावन वास कर रज में विश्राम भला - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (88)

(कवित्त)
वृन्दावन वास कर रज में विश्राम भला,
मखमली गद्दों से न प्रीति को निबाहिये। [1]
वृन्दावन वास कर छाक छाछ पीना भला,
मेवा मिष्ठानन के नहीं स्वाद को सराहिये॥ [2]
वृन्दावन वास कर आभीरों का संग भला,
बड़े बड़े राजा लोग व्यर्थ में उमाहिये। [3]
वृन्दावन वास कर नर्क का निवास भला,
वृन्दावन छोड़ नहीं स्वर्गलोक चाहिये॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (88)

श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए यहाँ की रज में विश्राम करना उत्तम है, न कि मखमली गद्दों के प्रति मोह बनाए रखना। [1]

वृंदावन धाम में वास करते हुए यहाँ की छाछ पीना श्रेष्ठ है, न कि स्वाद के लिए मेवा-मिठाई आदि की लालसा करना। [2]

वृंदावन में निवास करते हुए अभीरों के संग समय बिताना श्रेष्ठ है, न कि बड़े-बड़े राजाओं से मिलने की व्यर्थ इच्छा करना। [3]

नरक जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए भी वृंदावन में रहना उत्तम है, न कि वृंदावन को छोड़कर स्वर्गलोक चले जाना। [4]