प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

(राग कल्याण)
प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं
मेरे हृदै सरोवर तें कमोदिनी फूली। [1]
मन के मनोरथ तरंग अपार सुन्दर्यता
तहाँ गति भूली॥ [2]
तेरौ कोप ग्राह ग्रसैं लियैं जात छुड़ायौ न छूटत
रह्यौ बुधि बल झूली। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा चरन बंसी सौं गहि
काढ़ि रहे लटपटाइ गहि भुजमूली॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

लालजी (श्री कृष्ण) श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, आपके चन्द्र वदन को देखकर मेरे हृदय रूपी सरोवर में चाह रूपी कमल प्रफुल्लित हुई है। [1]

लालजी के मन में अनेक प्रकार के मनोरथ की अपार तरंगें तरंगित हो रही हैं। श्री राधा की रूप माधुरी के अपार सौंदर्य के दर्शन कर लालजी का मन भी अपनी गति भूल गया है। [2]

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, आपका मान [कोप] ग्राह (मगरमच्छ) बनकर मेरे ह्रदय सरोवर में खिले प्रेम रुपी कमल को ग्रस रहा है और खींचते ले जा रहा है, प्रयास करने पर भी मैं आपका मान छुड़ा नहीं पा रहा हूँ, मेरी बुद्धि और बल परास्त हो गए हैं तथा दुःख के सागर में झूलने लगे हैं। [3]

श्री हरिदासजी की स्वामिनी श्री श्यामा जू लालजी को दुख समुद्र से अपने चरण रूपी बंसी (मछली पकड़ने की छड़ी) में फँसा कर उबार लेती हैं। दोनों प्रिया प्रियतम प्रेम समुद्र में कंधे से कंधे मिला झूलने लगते हैं। [4]