(राग विभास, त्रिताल)
हमारी लाड़ली अति ही भोरी।
अवगुन जन के गिनत न कबहूँ, कृपामयी वृषभान किशोरी॥ [1]
कैसेहु चरन-शरन में आवे, वेगहि कृपा करें करोरी।
श्रीगोपाल हित हरी स्वामिनी, शीश नवाओ पौरी॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (114)
हमारी लाड़ली श्री राधा अति ही भोली हैं। वृषभानु नंदिनी अपने शरण में आये हुए के अवगुण नहीं देखती, वे परम कृपामयी हैं। [1]
श्री राधा के चरण कमलों की शरण में आने वाला कैसा भी पतित क्यों न हो, वे शीघ्र ही उस पर अनंत कृपा बरसा देती हैं। श्री हित गोपालदास जी कहते हैं कि वे श्री हरि की स्वामिनी श्री राधा के महल की पौरी पर शीश नवाकर प्रणाम करते हैं । [2]
हमारी लाड़ली अति ही भोरी।
अवगुन जन के गिनत न कबहूँ, कृपामयी वृषभान किशोरी॥ [1]
कैसेहु चरन-शरन में आवे, वेगहि कृपा करें करोरी।
श्रीगोपाल हित हरी स्वामिनी, शीश नवाओ पौरी॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (114)
हमारी लाड़ली श्री राधा अति ही भोली हैं। वृषभानु नंदिनी अपने शरण में आये हुए के अवगुण नहीं देखती, वे परम कृपामयी हैं। [1]
श्री राधा के चरण कमलों की शरण में आने वाला कैसा भी पतित क्यों न हो, वे शीघ्र ही उस पर अनंत कृपा बरसा देती हैं। श्री हित गोपालदास जी कहते हैं कि वे श्री हरि की स्वामिनी श्री राधा के महल की पौरी पर शीश नवाकर प्रणाम करते हैं । [2]

![हमारी लाड़ली अति ही भोरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (114)](https://images.brajrasik.org/661fee5feb91860008d24e59-m.jpeg)