(सवैया)
एक सु तीरथ डोलत है, इक बार हजार पुरान बके हैं। [1]
एक लगे जप में तप में, इक सिद्ध समाधिन में अटके हैं॥ [2]
चेत जु देखत हौ रसखान सु, मूढ़ महा सिगरे भटके हैं। [3]
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह, स्याम गुपाल पै वारि छके हैं॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कोई मनुष्य तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है, कोई हजारों बार पुराणों की कथाएँ सुनता है; अर्थात् पुराणों का पाठ करता है। [1]
कोई जप, तप आदि में लगा हुआ है, तो कोई सिद्ध बनकर समाधि में अटका हुआ है। [2]
रसखान कहते हैं कि यदि सावधान होकर इन्हें देखा जाए, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ये सब महामूर्ख बनकर भटक रहे हैं। [3]
सच्चे तो वे मनुष्य हैं, जो स्वयं को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर, उनकी मस्ती में छके हैं। [4]
एक सु तीरथ डोलत है, इक बार हजार पुरान बके हैं। [1]
एक लगे जप में तप में, इक सिद्ध समाधिन में अटके हैं॥ [2]
चेत जु देखत हौ रसखान सु, मूढ़ महा सिगरे भटके हैं। [3]
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह, स्याम गुपाल पै वारि छके हैं॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कोई मनुष्य तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है, कोई हजारों बार पुराणों की कथाएँ सुनता है; अर्थात् पुराणों का पाठ करता है। [1]
कोई जप, तप आदि में लगा हुआ है, तो कोई सिद्ध बनकर समाधि में अटका हुआ है। [2]
रसखान कहते हैं कि यदि सावधान होकर इन्हें देखा जाए, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ये सब महामूर्ख बनकर भटक रहे हैं। [3]
सच्चे तो वे मनुष्य हैं, जो स्वयं को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर, उनकी मस्ती में छके हैं। [4]

