प्रिया प्रियतम जिमि सुख लहै, सोई आपनों धर्म।
जामें जाय न अनन्यता, सोई आपनों कर्म॥
- श्री चरण दास
जिसमें प्रिया-प्रियतम को सुख मिलता है, केवल वही हमारा धर्म है। जिसमें उनकी अनन्यता भंग नहीं होती, वही हमारा कर्म है।
जामें जाय न अनन्यता, सोई आपनों कर्म॥
- श्री चरण दास
जिसमें प्रिया-प्रियतम को सुख मिलता है, केवल वही हमारा धर्म है। जिसमें उनकी अनन्यता भंग नहीं होती, वही हमारा कर्म है।

