मेरौ लाल रंगीलौ रंग भर्यौ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (23)

मेरौ लाल रंगीलौ रंग भर्यौ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (23)

(राग सारंग)
मेरौ लाल रंगीलौ रंग भर्यौ। [1]
जो भावै सो करहु किसोरी
मोहन तेरे बस पर्यौ॥ [2]
जमुना - पुलिन निकुंज - भवन में,
सर्वसु सचि तो कौं धर्यौ। [3]
श्रीबीठलविपुल विनोद बिहारी,
सगुन गाँठि दै बर जु बर्यौ॥ [4]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (23)

हे किशोरी श्री राधा ! मेरे रंगीले लाल (श्री कृष्ण) में तो एक मात्र प्रेम-रस-रंग ही भरा हुआ है। [1]

हे किशोरी जू, जो आपको भाए वह कीजिये क्योंकि लालजी तो आपके वशीभूत हैं। [2]

निकुंज-भवन के सन्निकट ही प्रवाहित यमुनाजी को साक्षी बनाकर लाल जी ने आपको अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया है। [3]

श्री विट्ठलविपुल देव जी कहते हैं कि हे श्री राधा, विनोद बिहारी श्री कृष्ण को अत्यंत सुंदर घड़ी में गाँठ बांधकर आपने वर रूप में वरण किया है। [4]