(राग रामकली)
तेई रसिक अनन्य जानिवै।
जिनकौ विषय-विकार न, हरिसौं रति, तेई साधु मानिवै॥ [1]
तिनकी संगति पतित सु उध्दरै, जौ वारक घर आनिवै।
तिनके चरनोदकसौं अपनैं, नख-शिख गातिन सानिवै॥ [2]
तिनकी पावन जूठनि जैंवत, तबहीं हरि हिय आनिवै।
तिनके वचन श्रवन सुनि तिहिं छिन, मन-संदेह भानिवै॥ [3]
तिनकी जीवनि-धन वृंदावन, जीवत मरत बखानिवै।
व्यास राधिका-रवन भवन बिनु, तेई क्यौं पहिचानिवै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (178)
उन्हीं को रसिक-अनन्य जानना चाहिए, जिनके अंदर विषय-विकार नहीं, अपितु श्री हरि से रति है। उन्हें ही साधु मानना चाहिए। [1]
ऐसे रसिक अनन्य के संग से पतित का भी उद्धार हो जाता है यदि जीव उन्हें एक बार अपने घर ले आये। उनके चरणोदक को साधक को अपने अंग-प्रत्यंगों में लगाना चाहिए । [2]
ऐसे रसिकों का जूठन प्रसाद खाने से हृदय में शीघ्र ही श्री हरि पधारते हैं। इन रसिक-अनन्य भक्तों के वचनामृत को श्रवण करने से मन के समस्त संदेह मिट जाते हैं। [3]
ऐसे रसिक अनन्ययों का जीवन धन श्री वृंदावन धाम ही है, जिसका बखान वे जीवन से मृत्यु पर्यंत तक करते रहते हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ये रसिक अनन्य श्री राधिकारमण के निकुंज भवन की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते हैं। [4]
तेई रसिक अनन्य जानिवै।
जिनकौ विषय-विकार न, हरिसौं रति, तेई साधु मानिवै॥ [1]
तिनकी संगति पतित सु उध्दरै, जौ वारक घर आनिवै।
तिनके चरनोदकसौं अपनैं, नख-शिख गातिन सानिवै॥ [2]
तिनकी पावन जूठनि जैंवत, तबहीं हरि हिय आनिवै।
तिनके वचन श्रवन सुनि तिहिं छिन, मन-संदेह भानिवै॥ [3]
तिनकी जीवनि-धन वृंदावन, जीवत मरत बखानिवै।
व्यास राधिका-रवन भवन बिनु, तेई क्यौं पहिचानिवै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (178)
उन्हीं को रसिक-अनन्य जानना चाहिए, जिनके अंदर विषय-विकार नहीं, अपितु श्री हरि से रति है। उन्हें ही साधु मानना चाहिए। [1]
ऐसे रसिक अनन्य के संग से पतित का भी उद्धार हो जाता है यदि जीव उन्हें एक बार अपने घर ले आये। उनके चरणोदक को साधक को अपने अंग-प्रत्यंगों में लगाना चाहिए । [2]
ऐसे रसिकों का जूठन प्रसाद खाने से हृदय में शीघ्र ही श्री हरि पधारते हैं। इन रसिक-अनन्य भक्तों के वचनामृत को श्रवण करने से मन के समस्त संदेह मिट जाते हैं। [3]
ऐसे रसिक अनन्ययों का जीवन धन श्री वृंदावन धाम ही है, जिसका बखान वे जीवन से मृत्यु पर्यंत तक करते रहते हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ये रसिक अनन्य श्री राधिकारमण के निकुंज भवन की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते हैं। [4]

