हौं मानत हौं सदा को, हौं पातक अवतार। अधम उधारन विरद पर, तुम तो करहु विचार॥ - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (82) हे श्री कृष्ण ! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है, यह मैं मानता हूँ। किंतु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो।