वृन्दावननिवासेऽपि तद्रसानुभवं विना।
रसलिप्सुर्न संतोषं लभते मित्र कर्हिचित्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (6.3)
अरे मित्र! रस का पिपासु रसिक भक्त तो श्री वृंदावन में निवास हो जाने पर भी, जब तक उस रस का स्वयं अनुभव न कर ले, तब तक कभी संतोष नहीं पाता।
रसलिप्सुर्न संतोषं लभते मित्र कर्हिचित्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (6.3)
अरे मित्र! रस का पिपासु रसिक भक्त तो श्री वृंदावन में निवास हो जाने पर भी, जब तक उस रस का स्वयं अनुभव न कर ले, तब तक कभी संतोष नहीं पाता।

