(राग सोरठा जलद तिताला)
राधा प्यारी जू की झूलन आजु बनी ।
लहँगा सुरंग चूनरी कंचुकी सोध सनी ॥ [1]
झूमि झूमि घन गरजत मंद मंद रमके दामिन रबनी ।
फूले द्रुम प्रफुलित बल्ली सब झुकि परसत अवनीं ॥ [2]
गावत जील दुंति सुरलै लै मिल ब्रज की कमनी ।
किशोरीदास ब्रजचन्द्र झुलावत रसिकनि मुकट मनी ॥ [3]
- श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)
आज, श्री राधा प्यारी जू का झूला बहुत सुंदर ढंग से शोभायमान है। उनका रंगीन लहंगा और चुनरी कंचुकी की सुंदरता अद्वितीय है। [1]
झूम झूम कर बादल गरज रहे हैं और मंद मंद बिजली चमक रही है। समस्त वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित होकर वृंदावन की पावन भूमि को नतमस्तक हैं। [2]
मेंढक आदि जंतु मधुर धुन से गुंजार कर रहे हैं एवं वृंदावन की किशोरी स्त्रियों के संग ताल से ताल मिलाकर मधुर गान कर रहे हैं। श्री किशोरीदास कहते हैं कि ब्रजचंद्र बिहारी (श्री श्यामसुंदर) आज श्री राधा प्यारी को झूला झूला रहे हैं जो रसिकों के चूड़ामणि हैं। [3]
राधा प्यारी जू की झूलन आजु बनी ।
लहँगा सुरंग चूनरी कंचुकी सोध सनी ॥ [1]
झूमि झूमि घन गरजत मंद मंद रमके दामिन रबनी ।
फूले द्रुम प्रफुलित बल्ली सब झुकि परसत अवनीं ॥ [2]
गावत जील दुंति सुरलै लै मिल ब्रज की कमनी ।
किशोरीदास ब्रजचन्द्र झुलावत रसिकनि मुकट मनी ॥ [3]
- श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)
आज, श्री राधा प्यारी जू का झूला बहुत सुंदर ढंग से शोभायमान है। उनका रंगीन लहंगा और चुनरी कंचुकी की सुंदरता अद्वितीय है। [1]
झूम झूम कर बादल गरज रहे हैं और मंद मंद बिजली चमक रही है। समस्त वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित होकर वृंदावन की पावन भूमि को नतमस्तक हैं। [2]
मेंढक आदि जंतु मधुर धुन से गुंजार कर रहे हैं एवं वृंदावन की किशोरी स्त्रियों के संग ताल से ताल मिलाकर मधुर गान कर रहे हैं। श्री किशोरीदास कहते हैं कि ब्रजचंद्र बिहारी (श्री श्यामसुंदर) आज श्री राधा प्यारी को झूला झूला रहे हैं जो रसिकों के चूड़ामणि हैं। [3]

