कदँब तर ठाड़े हैं पिय प्यारी - श्री विट्ठल दास

कदँब तर ठाड़े हैं पिय प्यारी - श्री विट्ठल दास

(राग-सोरठ मलार, ताल-धमार)
कदँब तर ठाड़े हैं पिय प्यारी ।
मोहन के सिर मुकुट बिराजत, इत लहरिया की सारी ॥ [1]
मंद-मंद बरषत चहुँ दिसि ते, चमकत बीज-छटारी ।
मुरलि बजावत श्रीनँदनंदन, गावत राग मलारी ॥ [2]
लेत तान हरि के सँग राधा, होत रंग अति भारी ।
श्रीबिट्ठल गिरिधर कौं रिझवत श्रीवृषभानदुलारी ॥ [3]

- श्री विट्ठल दास

हे सखियों! आज की कैसी अद्भुत शोभा बनी है। प्रीतम श्री कृष्ण के मस्तक पर तो मोर मुकुट शोभा दे रहा है और प्रियाजी श्री राधा ने सुंदर लहरिया की सारी पहन रखी है। [1]

जैसे जैसे प्यारे मंद-मंद सुर से मुरली में मलार राग अलाप रहे हैं, ठीक वैसे ही मेघ भी मंद-मंद गरजन से बंसी के सुर में अपनी गरजना कर सुर को मिला रहा है । [2]

और तो और हमारी लाड़िली प्यारी जू भी श्री हरि के तान के संग सुंदर राग मलार में अद्भुत ढंग से गान कर रंग (रस) को नित्य ही बढ़ा रही हैं । श्री वल्लभ दास जी कहते हैं कि श्री गिरिधर लाल को वृषभानु दुलारी श्री राधा अति ही रिझा रही हैं । [3]