लाड़ली लाल दोउ, रस रगमगे अपार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (4)

लाड़ली लाल दोउ, रस रगमगे अपार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (4)

लाड़ली लाल दोउ, रस रगमगे अपार ।
मगन महा रस सिंधु में, तन मन रहि न संभार ॥ 

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (4)

नित्य विहार के अपार रस में रंगे, श्री लाड़ली लाल अपने तन और मन की सुधि को भुलाए हुए, उस महारस सिंधु में सदा मगन हैं।