एक हु बेर पुकारत आरत - श्री छबीले जी

एक हु बेर पुकारत आरत - श्री छबीले जी

(सवैया)
एक हु बेर पुकारत आरत, दीन गिरा जन की सुन पावें । [1]
ताकर उँच ना नीच गिने, गहि कैं भुज सौं निज कण्ठ लगावें ॥ [2]
कर देयं अभय तिहूँ लोकन में, ताहि नहीं छिन हूँ विसरावें । [3]
ऐसे 'छबीले' कृपालु बिहारी, सदा हरिदास की आस पुजावें ॥ [4]

- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी

जब कोई दीन आर्त भरी पुकार से उसे एक बार भी पुकारता है, तो वह सुनता है। [1]

वह उसे ऊँचा या नीचा नहीं समझता; अपितु भुजाओं से पकड़ कर अपने गले से लगा लेता है। [2]

उसे तीनों लोकों में निर्भयता प्रदान कर, एक क्षण को भी नहीं भुलाता। [3]

श्री छबीले जी कहते हैं कि ऐसे परम कृपालु श्री बाँके बिहारी लाल सदा अपने दासों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। [4]