संग सजातिन को करै, देहि बिजाती त्याग - श्री सरस माधुरी

संग सजातिन को करै, देहि बिजाती त्याग - श्री सरस माधुरी

संग सजातिन को करै, देहि बिजाती त्याग ।
ऐसी रहनी सों रहै, लहै अचल अनुराग ॥

- श्री सरस माधुरी

जब जीव मायिक व्यक्तियों के संग का त्याग कर अपने सदा के सजाति (अर्थात् अनन्य रसिकों) का ही केवल संग करता है, तो वह उस अचल दिव्य प्रेम को प्राप्त कर लेता है ।