संग न अब काहू कौ कीजै ।
माला धरें हेत कछु औरै ताहि सु धोका दीजै ॥ [1]
जहाँ निरंतर परमारथ स्वारथ कछू न सुनीजै ।
तिनके संग बढ़े छिन छिन रति पूँजी कछू न छीजै ॥ [2]
मानुष तन कागद कौ पुतरा विनसि जाय जो भीजै ।
श्रीबिहारी दास साँचो परमारथ नाच गाइ जग जीजै ॥ [3]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (108)
हे भाई! जगत में अब संग करने योग्य कोई नहीं रहा है । आज कल आध्यात्मिक जगत के जीव, अपने हाथों में माला लेकर नाम जप तो करते रहते हैं परंतु उनका उद्देश्य एवं ह्रदय का प्रेम तो कहीं और ही होता है, और साक्षात श्री हरि को ही धोखा देते रहते हैं । ऐसों का संग करने से क्या होना है । [1]
संग केवल उनका ही करना चाहिए, जहां निरंतर परमार्थ के अतिरिक्त किसी प्रकार का स्वार्थ सुनने में भी न आए। उनके संग से ही तुम्हारी भाव रूपी पूंजी प्रतिदिन बढ़ती रहेगी कभी घटेगी नहीं । [2]
यह मनुष्य देह तो कागज़ के पुतले के समान है, जिसमें कालरूपी पानी लगते ही नष्ट हो जाएगा। इस मानव देह की एक एक श्वास अति दुर्लभ है, अतः श्री बिहारिन देव जी महाराज कहते हैं कि या तो असंग रहो अथवा केवल साँचे रसिक संतों का ही संग करो, जिनके प्रभाव से नाचते गाते हुए इस संसार में तुम प्रभु को रिझा लोगे। [3]
माला धरें हेत कछु औरै ताहि सु धोका दीजै ॥ [1]
जहाँ निरंतर परमारथ स्वारथ कछू न सुनीजै ।
तिनके संग बढ़े छिन छिन रति पूँजी कछू न छीजै ॥ [2]
मानुष तन कागद कौ पुतरा विनसि जाय जो भीजै ।
श्रीबिहारी दास साँचो परमारथ नाच गाइ जग जीजै ॥ [3]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (108)
हे भाई! जगत में अब संग करने योग्य कोई नहीं रहा है । आज कल आध्यात्मिक जगत के जीव, अपने हाथों में माला लेकर नाम जप तो करते रहते हैं परंतु उनका उद्देश्य एवं ह्रदय का प्रेम तो कहीं और ही होता है, और साक्षात श्री हरि को ही धोखा देते रहते हैं । ऐसों का संग करने से क्या होना है । [1]
संग केवल उनका ही करना चाहिए, जहां निरंतर परमार्थ के अतिरिक्त किसी प्रकार का स्वार्थ सुनने में भी न आए। उनके संग से ही तुम्हारी भाव रूपी पूंजी प्रतिदिन बढ़ती रहेगी कभी घटेगी नहीं । [2]
यह मनुष्य देह तो कागज़ के पुतले के समान है, जिसमें कालरूपी पानी लगते ही नष्ट हो जाएगा। इस मानव देह की एक एक श्वास अति दुर्लभ है, अतः श्री बिहारिन देव जी महाराज कहते हैं कि या तो असंग रहो अथवा केवल साँचे रसिक संतों का ही संग करो, जिनके प्रभाव से नाचते गाते हुए इस संसार में तुम प्रभु को रिझा लोगे। [3]

