(कवित्त)
राज चक्रवर्ती हू कों, आदरै न मेरौ मन,
स्वप्न की सी माया जान, वाहि निदरत है। [1]
स्वर्ग हु सौं द्रोह करै, बहु बिध क्लेश जानि,
ब्रह्मा हू कौ पद ताकी, चाह न करत है॥ [2]
मुक्ति सौं तो डरै जामें, अपनौ विनाश होत,
लोक वैकुण्ठ हू में, हरषि न ढरत है। [3]
राधा रति रंगी बन, विहरत संगी ऐसे,
कृष्ण कौ स्वरूप ‘चन्द’, हिय धरत है॥ [4]
- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है। [1]
स्वर्ग को अनंत दुखों का देने वाला जान कर उससे द्रोह रखता है। ब्रह्म पद की तो चाह भी नहीं रखता। [2]
मुक्ति से तो भयभीत रहता है क्योंकि मुक्ति से सदा के लिए जीव का विनाश हो जाता है। विष्णु लोक वैकुण्ठ आदि की प्राप्ति से भी हर्षित नहीं होता। [3]
उसे (मेरे मन को) तो श्री राधा प्रेम में रंगे वृन्दावन विहारी श्रीकृष्ण का ही लोभ बना रहता है। [4]
राज चक्रवर्ती हू कों, आदरै न मेरौ मन,
स्वप्न की सी माया जान, वाहि निदरत है। [1]
स्वर्ग हु सौं द्रोह करै, बहु बिध क्लेश जानि,
ब्रह्मा हू कौ पद ताकी, चाह न करत है॥ [2]
मुक्ति सौं तो डरै जामें, अपनौ विनाश होत,
लोक वैकुण्ठ हू में, हरषि न ढरत है। [3]
राधा रति रंगी बन, विहरत संगी ऐसे,
कृष्ण कौ स्वरूप ‘चन्द’, हिय धरत है॥ [4]
- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है। [1]
स्वर्ग को अनंत दुखों का देने वाला जान कर उससे द्रोह रखता है। ब्रह्म पद की तो चाह भी नहीं रखता। [2]
मुक्ति से तो भयभीत रहता है क्योंकि मुक्ति से सदा के लिए जीव का विनाश हो जाता है। विष्णु लोक वैकुण्ठ आदि की प्राप्ति से भी हर्षित नहीं होता। [3]
उसे (मेरे मन को) तो श्री राधा प्रेम में रंगे वृन्दावन विहारी श्रीकृष्ण का ही लोभ बना रहता है। [4]

