धन धन वृंदावन के बंदर ।
आन कान काहू की नहीं मानें, लूटें सब के अंतर ॥ [1]
गैल गिरारे कूदत डोलें, कहा हवेली मंदिर ।
अभयराम ये हूँ बड़भागी, या बन के सब बंदर ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (79)
श्री वृंदावन धाम के बंदर धन्य धन्य हैं जो किसी की नहीं मानते, सभी के सामान लूट लेते हैं । [1]
वे गलियों में कूदते डोलते रहते हैं चाहे महल हो या मंदिर, उन्हें किसी की परवाह नहीं । श्री अभयराम जी कहते हैं, ये बंदर वृंदावन में निवास करते हैं अत: यह परम भाग्यशाली हैं। [2]
आन कान काहू की नहीं मानें, लूटें सब के अंतर ॥ [1]
गैल गिरारे कूदत डोलें, कहा हवेली मंदिर ।
अभयराम ये हूँ बड़भागी, या बन के सब बंदर ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (79)
श्री वृंदावन धाम के बंदर धन्य धन्य हैं जो किसी की नहीं मानते, सभी के सामान लूट लेते हैं । [1]
वे गलियों में कूदते डोलते रहते हैं चाहे महल हो या मंदिर, उन्हें किसी की परवाह नहीं । श्री अभयराम जी कहते हैं, ये बंदर वृंदावन में निवास करते हैं अत: यह परम भाग्यशाली हैं। [2]

