नेहिन की गति जानत भाखी।
ज्यों गंगा बिच पर्यौ पपीहा, स्वाति-बूँद बिन और न चाखी ॥ [1]
जल बिन मीन, पलक नहिं जीवै, जो कोउ चाहौ पय में राखी ।
चंद्र चन्द्रिका बिन नहीं निरखत, प्रगट चकोर जगत में साखी ॥ [2]
श्रीवन तजि त्यौं चैन न पावैं, रसिकन लोभ दिखावौ लाखी ।
‘अली किशोरी’ पिय गोरी हित, प्रेम विवस मरजादा नाखी ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)
प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है। [1]
मीन बिना जल के नहीं जी सकती, चाहे उसे किसी भी पय में रखो। जगत में सुप्रसिद्ध साखी के अनुसार, चकोर पक्षी भी सदा चंद्र की किरणों को छोड़ अन्य किसी और की तरफ नहीं निहारता। [2]
उसी प्रकार रसिकजन भी श्री वृंदावन को त्याग कर अन्य कहीं चैन नहीं पाते, चाहे उन्हें लाखों लोभ दिखाया जाए। श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि ऐसे रसिकों ने श्री राधा कृष्ण के प्रेम के वशीभूत होकर समस्त मर्यादाओं को सदा सदा के लिए त्याग दिया है। [3]
ज्यों गंगा बिच पर्यौ पपीहा, स्वाति-बूँद बिन और न चाखी ॥ [1]
जल बिन मीन, पलक नहिं जीवै, जो कोउ चाहौ पय में राखी ।
चंद्र चन्द्रिका बिन नहीं निरखत, प्रगट चकोर जगत में साखी ॥ [2]
श्रीवन तजि त्यौं चैन न पावैं, रसिकन लोभ दिखावौ लाखी ।
‘अली किशोरी’ पिय गोरी हित, प्रेम विवस मरजादा नाखी ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)
प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है। [1]
मीन बिना जल के नहीं जी सकती, चाहे उसे किसी भी पय में रखो। जगत में सुप्रसिद्ध साखी के अनुसार, चकोर पक्षी भी सदा चंद्र की किरणों को छोड़ अन्य किसी और की तरफ नहीं निहारता। [2]
उसी प्रकार रसिकजन भी श्री वृंदावन को त्याग कर अन्य कहीं चैन नहीं पाते, चाहे उन्हें लाखों लोभ दिखाया जाए। श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि ऐसे रसिकों ने श्री राधा कृष्ण के प्रेम के वशीभूत होकर समस्त मर्यादाओं को सदा सदा के लिए त्याग दिया है। [3]

