नाम रूप विन गुन कहा, केसर कुसुम कसूँभ ।
श्रीबिहारीदास बिनही कसैं, दोऊ दीसैं ऊंभ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (504)
बिना गुण के परीक्षण किए, नाम तथा रूप एक समान हैं जिसका स्वरूप समझ में नहीं आ सकता है, जैसे केसर एवं कुसुम्भ के फूल कसे बिना एक समान ही दिखते हैं । (अर्थात् नाम एवं रूप की उपासना करते हुए गुणों का चिंतन तो अवश्य करना चाहिए)
श्रीबिहारीदास बिनही कसैं, दोऊ दीसैं ऊंभ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (504)
बिना गुण के परीक्षण किए, नाम तथा रूप एक समान हैं जिसका स्वरूप समझ में नहीं आ सकता है, जैसे केसर एवं कुसुम्भ के फूल कसे बिना एक समान ही दिखते हैं । (अर्थात् नाम एवं रूप की उपासना करते हुए गुणों का चिंतन तो अवश्य करना चाहिए)

