अबैं कहा कहि हौं अहो राधा रूप रसाल - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (31)

अबैं कहा कहि हौं अहो राधा रूप रसाल - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (31)

अबैं कहा कहि हौं अहो? राधा रूप रसाल ।
ताकि कछु भुवभंग में, मोहन मदन विहाल ॥ 

- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (31)

श्री राधा का रूप रस से भरपूर है जिसकी सुंदरता अद्वितीय है जिसके विषय में मैं क्या कहूँ? उनकी भौंहों की कुछ भंगिमा में ही, कामदेव को भी मोहित करने वाले श्री कृष्ण, पूर्ण रूप से मुग्ध और विह्वल हो गए हैं।