मेरी बिहारिनि मेरी मेरी ।
तन मन, मिलि विहरत रस माती, हँसि हँसि छिन छिन मो तन हेरी ॥ [1]
हित की जानि करै रुचि सोई, सदाई रहत प्रान सों भेरी ।
श्रीललितकिसोरी रसिक सिरोमनि, याही सुख में रहत अनेरी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (89)
मेरी बिहारिनी (राधा), मेरी है, मेरी है जो तन और मन से मिली हुई, रस में उन्मत्त होकर, विहारण करती है तथा मेरी ओर निहार निहार कर हर क्षण मुस्कुराती है । [1]
मेरे हित को जान वे सदा सदा वही करती है जो मुझको रुचिकर होता है एवं सदा मेरे प्राणों के समान अंग संग ही रहती हैं । श्री ललितकिशोरी जी एवं रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी सदा इस नित्य विहार रूपी अद्वितीय रस का ही आस्वादन करते हैं । [2]
तन मन, मिलि विहरत रस माती, हँसि हँसि छिन छिन मो तन हेरी ॥ [1]
हित की जानि करै रुचि सोई, सदाई रहत प्रान सों भेरी ।
श्रीललितकिसोरी रसिक सिरोमनि, याही सुख में रहत अनेरी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (89)
मेरी बिहारिनी (राधा), मेरी है, मेरी है जो तन और मन से मिली हुई, रस में उन्मत्त होकर, विहारण करती है तथा मेरी ओर निहार निहार कर हर क्षण मुस्कुराती है । [1]
मेरे हित को जान वे सदा सदा वही करती है जो मुझको रुचिकर होता है एवं सदा मेरे प्राणों के समान अंग संग ही रहती हैं । श्री ललितकिशोरी जी एवं रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी सदा इस नित्य विहार रूपी अद्वितीय रस का ही आस्वादन करते हैं । [2]

