(कवित्त)
प्यारी जू की भौंहनि की सहज मरोर माँझ,
गयौ है मरोरर्यौ मन मोहन कौ माई री। [1]
ऐसैं प्रेम रस लीन तिलहू ते भये छीन,
जैसैं जल बिन कंज रहै मुरझाई री॥ [2]
धीरज न नैंकू धरें नैंना नेह-नीर ढरैं,
बिवस पगनि ओर ढरयौ सीस जाइ री। [3]
व्याकुल विहारी लाल चितै अंक भरे बाल,
पाये प्रान तब “ध्रुव” मृदु मुसिकाइ री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (30)
अरी सखि! हमारी प्रिया जी की स्वाभाविक बंक भृकुटियों के नर्तन ने सभी का मन तो मोहा ही है, अब तो मनमोहन श्रीकृष्ण का हृदय भी इस नर्तन की मरोड़ में बिंध गया है। [1]
प्यारी जू की भौंहनि की सहज मरोर माँझ,
गयौ है मरोरर्यौ मन मोहन कौ माई री। [1]
ऐसैं प्रेम रस लीन तिलहू ते भये छीन,
जैसैं जल बिन कंज रहै मुरझाई री॥ [2]
धीरज न नैंकू धरें नैंना नेह-नीर ढरैं,
बिवस पगनि ओर ढरयौ सीस जाइ री। [3]
व्याकुल विहारी लाल चितै अंक भरे बाल,
पाये प्रान तब “ध्रुव” मृदु मुसिकाइ री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (30)
अरी सखि! हमारी प्रिया जी की स्वाभाविक बंक भृकुटियों के नर्तन ने सभी का मन तो मोहा ही है, अब तो मनमोहन श्रीकृष्ण का हृदय भी इस नर्तन की मरोड़ में बिंध गया है। [1]
वे ऐसे प्रेमरस में डूबे हुए हैं कि अपने अस्तित्व को ही विस्मृत कर बैठे हैं, जैसे जल के बिना कमल कुम्हला जाता है। [2]
प्रेम-विह्वल अवस्था में उनका धैर्य टूट चुका है, और उनकी आँखें निरंतर अश्रुपूर्ण रहती हैं। उनका मस्तक प्रेम की अधीनता में प्रिया के चरणों की ओर झुका रहता है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रियतम बिहारी लाल की इस अनूठी प्रेम-विह्वलता को देखकर नवयौवना प्रिया मृदु मुस्कान के साथ उन्हें अपने अंक में स्थान देती हैं। तब ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रियतम के प्राण पुनः शरीर में लौट आए हों, और वे सावधान एवं प्रसन्नचित्त हो जाते हैं। [4]

