मन लीनों प्यारे चितै, पै छटाँक नहिं देत ।
यहै कहा पाटी पढ़ी, दल को पीछो लेत ॥
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
हे कृष्ण! तुम मेरे मन को तो ज़बरदस्ती हर लेते हो, पर उसके बदले कटाक्ष तक नहीं देते। तुमने यह कला कहाँ से सीखा है कि केवल लेना ही जानते हो, देना नहीं ।
यहै कहा पाटी पढ़ी, दल को पीछो लेत ॥
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
हे कृष्ण! तुम मेरे मन को तो ज़बरदस्ती हर लेते हो, पर उसके बदले कटाक्ष तक नहीं देते। तुमने यह कला कहाँ से सीखा है कि केवल लेना ही जानते हो, देना नहीं ।

