(सवैया)
अति सुधौ सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बाँक नहीं। [1]
जहाँ साँच चलें तजि आपुनपो, झिझकैं कपटी जो निसाँक नहीं॥ [2]
घन आनंद प्यारे सुजान सुनो, इत एक तें दूसरी आंक नहीं। [3]
तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला, मन लेत पै देत छटॉक नहीं॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (267)
प्रेम का मार्ग अत्यंत सीधा है, जहाँ थोड़ी-सी भी चालाकी के साथ चलना असंभव है। [1]
इस मार्ग में सच्चाई से ही चला जाता है और अपने आप को सदा न्योछावर करके, अर्थात् निस्वार्थ भाव से ही आगे बढ़ा जाता है। यह मार्ग सच्चे प्रेमियों का है; छल-कपट रखने वालों को इस प्रेम मार्ग पर चलने में झिझक होती है। [2]
श्री घनानंद जी कहते हैं कि इस मार्ग में अपने एक प्रियतम के सिवा दूसरा कोई नहीं होता, अर्थात् इस प्रेम गली में केवल अपने प्रियतम के प्रति अनन्य होकर ही चला जाता है। [3]
परंतु हे श्रीकृष्ण, तुमने कहाँ से यह पाठ पढ़ा है, जो मेरा मन तो हर लिया है, परंतु अभी तक थोड़ा-सा भी छटाँक (छवि का दर्शन) नहीं दिया? (यह श्रीकृष्ण पर कटाक्ष किया गया है)। [4]
अति सुधौ सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बाँक नहीं। [1]
जहाँ साँच चलें तजि आपुनपो, झिझकैं कपटी जो निसाँक नहीं॥ [2]
घन आनंद प्यारे सुजान सुनो, इत एक तें दूसरी आंक नहीं। [3]
तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला, मन लेत पै देत छटॉक नहीं॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (267)
प्रेम का मार्ग अत्यंत सीधा है, जहाँ थोड़ी-सी भी चालाकी के साथ चलना असंभव है। [1]
इस मार्ग में सच्चाई से ही चला जाता है और अपने आप को सदा न्योछावर करके, अर्थात् निस्वार्थ भाव से ही आगे बढ़ा जाता है। यह मार्ग सच्चे प्रेमियों का है; छल-कपट रखने वालों को इस प्रेम मार्ग पर चलने में झिझक होती है। [2]
श्री घनानंद जी कहते हैं कि इस मार्ग में अपने एक प्रियतम के सिवा दूसरा कोई नहीं होता, अर्थात् इस प्रेम गली में केवल अपने प्रियतम के प्रति अनन्य होकर ही चला जाता है। [3]
परंतु हे श्रीकृष्ण, तुमने कहाँ से यह पाठ पढ़ा है, जो मेरा मन तो हर लिया है, परंतु अभी तक थोड़ा-सा भी छटाँक (छवि का दर्शन) नहीं दिया? (यह श्रीकृष्ण पर कटाक्ष किया गया है)। [4]

