अक्षर धुरकी पालकी, आई रसिकन लैन ।
‘वाह वाह' करि रहि गए, चढ़े सो पहुँचे एैन ॥
- श्री वृंदावन दास चाचा जी
रसिक संतों द्वारा लिखित वाणियाँ रूपी पालकी रसिक साधकों को लेने के लिए ही इस लोक में आई है। जिन्होंने इन्हें देखकर 'वाह वाह' किया, वे तो यहीं रह गए, और जो उस पर चढ़ गए (वाणियों में प्रेम से डूब गए), वे रसमय धाम में पहुँच गए।
‘वाह वाह' करि रहि गए, चढ़े सो पहुँचे एैन ॥
- श्री वृंदावन दास चाचा जी
रसिक संतों द्वारा लिखित वाणियाँ रूपी पालकी रसिक साधकों को लेने के लिए ही इस लोक में आई है। जिन्होंने इन्हें देखकर 'वाह वाह' किया, वे तो यहीं रह गए, और जो उस पर चढ़ गए (वाणियों में प्रेम से डूब गए), वे रसमय धाम में पहुँच गए।

