नैना घूमत हैं मद छाके - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.1)

नैना घूमत हैं मद छाके - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.1)

(राग नट)
नैना घूमत हैं मद छाके ।
जगे जम्हात, सिथिल पट भूसन, सुख संतोष न थाके ॥ [1]
पलकन पीक, अधर अंजन, रद छद कपोल ललना के ।
भगवत रसिक पौंछि अंचल मुख, प्यावत अधरसुधा के ॥ [2]

- श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ (6.1)

(श्रीयुगल की सुरतान्त छवि का अंकन है।) प्रिया-प्रियतम जमुहाई लेते हुए जाग रहे हैं। उनके मद-भरे नयन चंचल हो रहे हैं। वस्त्र-अलंकार अस्त-व्यस्त हैं। [1]

(प्रियतम द्वारा प्रियाजी के नेत्रों का परिचुम्बन किये जाने के कारण प्रियतम के अधरों की लालिमा से) प्रियाजी के पलक रंजित हो गये हैं और प्रियाजी के नयनों का अंजन प्रियतम के ओठों पर उतर आया है। प्रियाजी के कपोलों पर दन्तक्षत की छटा विराजमान है। अभी ये दोनों रस विलास से न तृप्त हुए हैं, न थके हैं, यह देख भगवत सखी अंचल से दोनों का मुख पोंछ कर, उन्हें पुन: परस्पर अधरामृत पान में प्रवृत करा देती हैं  । [2]