जयति वृषभानुजा कुँवरि राधे ।
सच्चिदानंद घन रसिक सिरमौर वर,
सकल वांछित सदा रहत साधे ॥ [1]
निगम आगम सुमृति रहे बहु भाँति जहँ,
कहि नहीं सकत गुणगण अगाधे ।
लाल हित रूप पर करहु करुणा प्रिये,
देहु वृंदा विपिन नित अबाधे ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
वृषभानु कुँवरी श्री राधे जू की जय हो, जो सच्चिदानंद हैं और जिनके प्रियतम श्यामसुन्दर रसिक सिरमौर हैं, तथा जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं। [1]
जिनके अगाध गुणों का गान करने का सामर्थ्य वेदों, शास्त्रों एवं स्मृतियों आदि में भी नहीं है। श्री हित रूप लाल जी कहते हैं, "हे प्रिया जू, मुझ पर करुणा कीजिए और श्री वृंदावन धाम में बाधा रहित नित्य वास प्रदान कीजिए"। [2]
सच्चिदानंद घन रसिक सिरमौर वर,
सकल वांछित सदा रहत साधे ॥ [1]
निगम आगम सुमृति रहे बहु भाँति जहँ,
कहि नहीं सकत गुणगण अगाधे ।
लाल हित रूप पर करहु करुणा प्रिये,
देहु वृंदा विपिन नित अबाधे ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
वृषभानु कुँवरी श्री राधे जू की जय हो, जो सच्चिदानंद हैं और जिनके प्रियतम श्यामसुन्दर रसिक सिरमौर हैं, तथा जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं। [1]
जिनके अगाध गुणों का गान करने का सामर्थ्य वेदों, शास्त्रों एवं स्मृतियों आदि में भी नहीं है। श्री हित रूप लाल जी कहते हैं, "हे प्रिया जू, मुझ पर करुणा कीजिए और श्री वृंदावन धाम में बाधा रहित नित्य वास प्रदान कीजिए"। [2]

