(कवित्त)
चाहे तू योग करि भृकुटी मध्य ध्यान धरि,
चाहे नाम रुप मिथ्या जानिकै निहार लै। [1]
निर्गुण निर्भय निराकार ज्योति व्याप रह्यौ,
ऐसो तत्वज्ञान निज मनमें तू धार लै॥ [2]
‘नारायण’ अपने कौ आप ही बखान करि,
"मोतें वह भिन्न नहीं" याविधि पुकार लै। [3]
जौं लौं तोहि नन्दकुमार नाहीं दृष्टी परयौ,
तौलौं तू भलै बैठि ब्रह्म को बिचार लै॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (11)
चाहे तू योग किया कर, अथवा भृकुटी के मध्य उसका ध्यान किया कर, अथवा चाहे तू उसका नाम, रूप मिथ्या जान कर उसे निहारने की कोशिश किया कर। [1]
भले ही तू अपने मन से ऐसा तत्वज्ञान मान ले कि वो निर्गुण, परतत्व एवं निराकार ज्योति स्वरूप में व्याप रहा है। [2]
भले ही तू यह मान कि जो परमात्मा है वही तू है, उस परमात्मा को चाहे तू इस विधि पुकार ले कि “वो मेरे से भिन्न नहीं है!" [3]
भले ही तू उस निराकार ब्रह्म का बैठ कर चिंतंन करता रह परंतु जब तक तुझ पर नंदकुमार (भगवान श्री कृष्ण) की कृपा दृष्टि नहीं पड़ेगी तब तक तू अपने साधन में सिद्धता (उस परम तत्व) को प्राप्त ही नहीं कर सकता। [4]
चाहे तू योग करि भृकुटी मध्य ध्यान धरि,
चाहे नाम रुप मिथ्या जानिकै निहार लै। [1]
निर्गुण निर्भय निराकार ज्योति व्याप रह्यौ,
ऐसो तत्वज्ञान निज मनमें तू धार लै॥ [2]
‘नारायण’ अपने कौ आप ही बखान करि,
"मोतें वह भिन्न नहीं" याविधि पुकार लै। [3]
जौं लौं तोहि नन्दकुमार नाहीं दृष्टी परयौ,
तौलौं तू भलै बैठि ब्रह्म को बिचार लै॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (11)
चाहे तू योग किया कर, अथवा भृकुटी के मध्य उसका ध्यान किया कर, अथवा चाहे तू उसका नाम, रूप मिथ्या जान कर उसे निहारने की कोशिश किया कर। [1]
भले ही तू अपने मन से ऐसा तत्वज्ञान मान ले कि वो निर्गुण, परतत्व एवं निराकार ज्योति स्वरूप में व्याप रहा है। [2]
भले ही तू यह मान कि जो परमात्मा है वही तू है, उस परमात्मा को चाहे तू इस विधि पुकार ले कि “वो मेरे से भिन्न नहीं है!" [3]
भले ही तू उस निराकार ब्रह्म का बैठ कर चिंतंन करता रह परंतु जब तक तुझ पर नंदकुमार (भगवान श्री कृष्ण) की कृपा दृष्टि नहीं पड़ेगी तब तक तू अपने साधन में सिद्धता (उस परम तत्व) को प्राप्त ही नहीं कर सकता। [4]

