बाँह डुलाबति आवति राधा -  श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (826)

बाँह डुलाबति आवति राधा - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (826)

(राग सारंग)
बाँह डुलाबति आवति राधा।
बदन कमल झँपति न उघारति रह्यौ है तिलक मिटि आधा॥ [1]
गिरिधर लाल कुंवर नंदनंदनतैं जु प्रेम करि लाधा ।
रहसि मिली प्राण प्यारे कौं रही न एकौ साधा ॥ [2]
कारज अधर मिल्यौ नैननि कौं मिटी काम की बाधा ।
‘परमानंद' स्वामी रति नागर तेरौ पुन्य अगाधा ॥ [3]

- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (826)

अपनी बाहों को झुलाते हुए, श्री राधा आ रही हैं। उनका कमल के समान मुख आधा ढका हुआ है, जिसके कारण उनका आधा तिलक मिटा हुआ है। [1]

गिरिधर लाल, नंद कुमार के अगाध प्रेम को संजोए हुए, वे अपने प्रियतम श्यामसुंदर से मिलती हैं, जिससे उनकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो गई हैं। [2]

श्री कृष्ण से श्री राधा के नेत्रों के मिलते ही कामदेव द्वारा उत्पन्न की गई समस्त बाधाएँ दूर हो जाती हैं। श्री परमानंद दास कहते हैं, ‘हे श्री राधे! मेरे प्रभु गिरिधर लाल पूर्ण रूप से आपके हैं, क्योंकि आपके पुण्य अगाध हैं। [3]