(सवैया)
काहू लियौ जप, काहू लियौ तप, काहू महाव्रत साध लियौ है। [1]
काहू लियौ गुन, काहू लियौ धन, काहू महा उन्माद हियो है॥ [2]
रंचक चारू चकोरिन दंपति, सम्पति प्रेम-पियूष पियौ है। [3]
राधिका-वल्लभ लाल के थार कौ, श्री हरिवंश प्रसाद लियौ है॥ [4]
- ब्रज के सवैया
श्री हित हरिवंश महाप्रभु की महाप्रसाद निष्ठा के संबंध में यह सवैया प्राचीन काल से प्रसिद्ध है। इस निष्ठा की रक्षा के लिए ही उन्होंने एकादशी के दिन भी महाप्रसाद का त्याग न करने की व्यवस्था की थी, जिसके कारण उन्हें समकालीन वैष्णव समाज का घोर विरोध भी सहन करना पड़ा था। श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा की गई यह अवहेलना दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई थी। इस पद का अर्थ कुछ इस प्रकार है:
किसी को जप का भरोसा है, किसी को तपस्या का, और किसी ने अपने हृदय में महान व्रतों को धारण किया हुआ है। [1]
कोई गुण और संपत्ति में गर्वित है, तो कोई अपने मन को उन्माद में डुबाना चाहता है। [2]
किन्तु श्री हित हरिवंश का मन तो चकोर की भाँति सदा श्री श्यामा-श्याम के युगल-रूप रूपी प्रेम-चंद्रमा में निमग्न है। [3]
उनकी अखंड निष्ठा श्री राधिकावल्लभ के महाप्रसाद में ही निहित है। [4]
काहू लियौ जप, काहू लियौ तप, काहू महाव्रत साध लियौ है। [1]
काहू लियौ गुन, काहू लियौ धन, काहू महा उन्माद हियो है॥ [2]
रंचक चारू चकोरिन दंपति, सम्पति प्रेम-पियूष पियौ है। [3]
राधिका-वल्लभ लाल के थार कौ, श्री हरिवंश प्रसाद लियौ है॥ [4]
- ब्रज के सवैया
श्री हित हरिवंश महाप्रभु की महाप्रसाद निष्ठा के संबंध में यह सवैया प्राचीन काल से प्रसिद्ध है। इस निष्ठा की रक्षा के लिए ही उन्होंने एकादशी के दिन भी महाप्रसाद का त्याग न करने की व्यवस्था की थी, जिसके कारण उन्हें समकालीन वैष्णव समाज का घोर विरोध भी सहन करना पड़ा था। श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा की गई यह अवहेलना दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई थी। इस पद का अर्थ कुछ इस प्रकार है:
किसी को जप का भरोसा है, किसी को तपस्या का, और किसी ने अपने हृदय में महान व्रतों को धारण किया हुआ है। [1]
कोई गुण और संपत्ति में गर्वित है, तो कोई अपने मन को उन्माद में डुबाना चाहता है। [2]
किन्तु श्री हित हरिवंश का मन तो चकोर की भाँति सदा श्री श्यामा-श्याम के युगल-रूप रूपी प्रेम-चंद्रमा में निमग्न है। [3]
उनकी अखंड निष्ठा श्री राधिकावल्लभ के महाप्रसाद में ही निहित है। [4]

