ये वा द्विषन्ति निन्दन्ति पापिनश्च हसन्ति च ।
कृष्णप्राणाधिकादेवदेवीं च राधिकां वराम् ॥
ब्रह्महत्याशतं ते च लभन्ते नात्र संशयः ।
तत्पापेन च पच्यन्ते कुम्भीपाके च रौरवे ॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 97 / छंद 49/50
श्रीकृष्ण की प्राण प्रिया श्री राधिकाजी से जो लोग द्वेष करते हैं उनका उपहास करते हैं, निन्दा करते हैं, उन पापी जीवों को निस्संदेह सैकड़ों ब्रह्मत्याओं का पाप लगता है जिसके कारण वे कुंभीपाक और रौरव के नरकों में बहुत काल तक पीड़ित होते हैं।
कृष्णप्राणाधिकादेवदेवीं च राधिकां वराम् ॥
ब्रह्महत्याशतं ते च लभन्ते नात्र संशयः ।
तत्पापेन च पच्यन्ते कुम्भीपाके च रौरवे ॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 97 / छंद 49/50
श्रीकृष्ण की प्राण प्रिया श्री राधिकाजी से जो लोग द्वेष करते हैं उनका उपहास करते हैं, निन्दा करते हैं, उन पापी जीवों को निस्संदेह सैकड़ों ब्रह्मत्याओं का पाप लगता है जिसके कारण वे कुंभीपाक और रौरव के नरकों में बहुत काल तक पीड़ित होते हैं।

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