(कवित्त)
जाके अंग अंग की बनक पै कनक वारै,
मोहै लेत मैन मन मोतिन के हारिए। [1]
ऐसी मन भावनी सौ मोहन जू कीनौ मान,
जाकी ये बड़ाई विधि गावै वेद चारिए॥ [2]
राधे जू को बदन बिलोको व्रजचन्द ‘हठी’,
चन्द जोति मंद नंद नंद पाइ धारिए। [3]
सची मंजु घोष सी सु मैनका तिलोतमा सी,
रम्भा सिवा रति सी रमा सी वारि डारिए॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (41)
जिनके प्रत्येक अंग की बनक पर कनक (सोना) भी फीका लगता है, जिनके मोतियों के हार की शोभा को देख कामदेव भी मोहित हो जाता है। [1]
ऐसी वे मनभावनी हैं, जो मोहन श्री कृष्ण से मान करती हैं, जिन श्री कृष्ण की महिमा को स्वयं ब्रह्मा चारों वेदों में गाते हैं। [2]
श्री हठी जी कहते हैं कि उनके मुख की दीप्ति के समक्ष चंद्रमा भी फीका दिखता है। ऐसे श्री मुख को निहारने के लिए व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण दौड़कर जाते हैं। [3]
स्वर्गीय अप्सराएँ सची (इंद्र की पत्नी), मेनका (स्वर्गीय नर्तकी), तिलोत्तमा (स्वर्गीय अप्सरा), रम्भा एवं अन्य देवियाँ पार्वती, रति (कामदेव की पत्नी), लक्ष्मी जी आदि को भी ऐसी श्री राधा के ऊपर वार डालिये। [4]
जाके अंग अंग की बनक पै कनक वारै,
मोहै लेत मैन मन मोतिन के हारिए। [1]
ऐसी मन भावनी सौ मोहन जू कीनौ मान,
जाकी ये बड़ाई विधि गावै वेद चारिए॥ [2]
राधे जू को बदन बिलोको व्रजचन्द ‘हठी’,
चन्द जोति मंद नंद नंद पाइ धारिए। [3]
सची मंजु घोष सी सु मैनका तिलोतमा सी,
रम्भा सिवा रति सी रमा सी वारि डारिए॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (41)
जिनके प्रत्येक अंग की बनक पर कनक (सोना) भी फीका लगता है, जिनके मोतियों के हार की शोभा को देख कामदेव भी मोहित हो जाता है। [1]
ऐसी वे मनभावनी हैं, जो मोहन श्री कृष्ण से मान करती हैं, जिन श्री कृष्ण की महिमा को स्वयं ब्रह्मा चारों वेदों में गाते हैं। [2]
श्री हठी जी कहते हैं कि उनके मुख की दीप्ति के समक्ष चंद्रमा भी फीका दिखता है। ऐसे श्री मुख को निहारने के लिए व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण दौड़कर जाते हैं। [3]
स्वर्गीय अप्सराएँ सची (इंद्र की पत्नी), मेनका (स्वर्गीय नर्तकी), तिलोत्तमा (स्वर्गीय अप्सरा), रम्भा एवं अन्य देवियाँ पार्वती, रति (कामदेव की पत्नी), लक्ष्मी जी आदि को भी ऐसी श्री राधा के ऊपर वार डालिये। [4]

