यह मन मारि जिवाईये, जियत न आवै काज - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, दोहावली (42)

यह मन मारि जिवाईये, जियत न आवै काज - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, दोहावली (42)

यह मन मारि जिवाईये, जियत न आवै काज ।
मारग रसिक नरेस के, चलनौं है इह साज ॥

- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, दोहावली (42)

रसिकों द्वारा प्रतिपादित भगवत् प्रेम के मार्ग का अनुसरण करने के लिए पहले इस मन को मारकर फिर उसे दोबारा जीवित करना होता है, तभी इस मार्ग में चला जा सकता है।