हमारी बाँह गही वृन्दावन - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)

हमारी बाँह गही वृन्दावन - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)

हमारी बाँह गही वृन्दावन ।
राख्यो अपनी सीतल छइयाँ, जग दुख घाम तज्यौ तन ॥[1]
मो मैं कछू क़ृपाबल नाहीं, हौं जानौं अपनें मन ।
नागरीदास नांव हित सौं करि, कृपा करायो धन-धन ॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)

वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है। [1]

मेरे में कोई बल नहीं है, यह मेरा हृदय भली प्रकार से जानता है। श्री नागरीदास कहते हैं कि धन्य धन्य हैं श्री राधिका रानी जिन्होनें नागरीदास (श्री राधा का दास) नाम के हित से (उसको सत्य कर) अर्थात् अपना दास मानकर मुझ पर वास्तविक कृपा बरसा दी! [2]