नेह खेत की द्रुमलता, सहचरी मोहनलाल ।
दृग करि करुणा रूपजल, सींचत राधा बाल ॥
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (102.1)
सहचरीगण और मोहन लाल श्री कृष्ण प्रेम-खेत की द्रुम-लता के समान हैं, श्री राधा नित्य ही उनको अपनी करुणामयी दृष्टि डालकर रूप के जल से सींचती हैं ।
दृग करि करुणा रूपजल, सींचत राधा बाल ॥
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (102.1)
सहचरीगण और मोहन लाल श्री कृष्ण प्रेम-खेत की द्रुम-लता के समान हैं, श्री राधा नित्य ही उनको अपनी करुणामयी दृष्टि डालकर रूप के जल से सींचती हैं ।

