(सवैया)
श्रीवृन्दावन वास दीजिए,आस यही वृषभानुदुलारी। [1]
वंशी वट तट नटनागर संग, करत केलि अवलौकों प्यारी॥ [2]
ललित किशोरी हूक उठत हिय, फूँकि बँसुरिया की दे मारी। [3]
दर्शन बिनु अति विकल रहत जिय, बाधा हरो श्रीराधा हमारी॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (4)
हे वृषभानु दुलारी श्री राधा! मेरी यही आशा है कि मुझे आप वृंदावन का अखंड वास प्रदान करें। [1]
जहाँ यमुना के पावन तट पर, वंशीवट के नीचे, आप प्रियतम के संग नित्य विहार करती हैं—उस अद्भुत लीला का साक्षात दर्शन हो। [2]
श्री ललित किशोरी कहते हैं—मेरे हृदय की वेदना को बांसुरी की स्वर-माधुरी ने और बढ़ा दिया है। [3]
आपके दर्शन के बिना मेरा मन अति व्याकुल है, अतः हे श्री राधा! मेरी इस बाधा का हरण कीजिए। [4]
श्रीवृन्दावन वास दीजिए,आस यही वृषभानुदुलारी। [1]
वंशी वट तट नटनागर संग, करत केलि अवलौकों प्यारी॥ [2]
ललित किशोरी हूक उठत हिय, फूँकि बँसुरिया की दे मारी। [3]
दर्शन बिनु अति विकल रहत जिय, बाधा हरो श्रीराधा हमारी॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (4)
हे वृषभानु दुलारी श्री राधा! मेरी यही आशा है कि मुझे आप वृंदावन का अखंड वास प्रदान करें। [1]
जहाँ यमुना के पावन तट पर, वंशीवट के नीचे, आप प्रियतम के संग नित्य विहार करती हैं—उस अद्भुत लीला का साक्षात दर्शन हो। [2]
श्री ललित किशोरी कहते हैं—मेरे हृदय की वेदना को बांसुरी की स्वर-माधुरी ने और बढ़ा दिया है। [3]
आपके दर्शन के बिना मेरा मन अति व्याकुल है, अतः हे श्री राधा! मेरी इस बाधा का हरण कीजिए। [4]

