अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9)

अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9)

अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि ।
राधे जू के चरण की रज, गदाधर सिर धूरि ॥

- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9)

जिनके अंग अंग से प्रेम बरसता है, वे ही समस्त सुखों की मूल हैं । श्री गदाधर भट्ट जी ऐसी श्री राधा के चरणों की रज को अपने सिर पर सदा रखते हैं ।