जल पूर्ण यमुना टिकारी पर टिकी हुई - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (31)

जल पूर्ण यमुना टिकारी पर टिकी हुई - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (31)

(कवित्त)
जल पूर्ण यमुना टिकारी पर टिकी हुई,
वंशीवट - मध्य रास - मण्डल तना हुआ। [1]
पवन भी वही है और गगन भी वही है,
निधुबन निकुंज लताओं से सना हुआ॥ [2]
मन्दिरों की कहे कौन प्रत्येक घर घर में,
बैठा श्यामंसुन्दर सनेह से सना हुआ। [3]
कृष्ण-पद प्रेमी सच्चे भक्त भावुकों के लिये,
आज भी वैसा ही है वृन्दावन बना हुआ॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (31)

आज भी यमुना जी तटों से होकर बहती है। वंशीवट के मध्य में रास मंडल फैला हुआ है। [1]

वही हवा बहती है, और वही आकाश है। निधिवन आज भी निकुंज लताओं से ढका हुआ है। [2]

मंदिरों की तो कौन कहे, यहाँ प्रत्येक घर में श्यामसुंदर प्रेम में उन्मत्त होकर विराजते हैं। [3]

श्री कृष्ण के चरण कमलों के सच्चे प्रेमियों और भावपूर्ण भक्तों के लिए, वृंदावन आज भी वैसा ही बना हुआ है। [4]