हौं हूँ आई देखन स्याम -  श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (46)

हौं हूँ आई देखन स्याम - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (46)

हौं हूँ आई देखन स्याम ।
सुन्दर नैन बिसाल साँवरौ, सब विधि पूरन काम ॥ [1]
हा-हा करत, तकत गति अगनति, प्रानप्रिया सुखधाम ।
श्रीललितमोहिनी कौ सुख पूरन, जामें बिहरैं आठों जाम ॥ [2]

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (46)

मैं उन श्यामसुन्दर को देखने आई हूँ, जो साँवले सलौने हैं, जिनके नेत्र विशाल हैं और जिन्हें श्री किशोरीजी ने सब प्रकार से पूर्णकाम कर रखा है। [1]

ये मोहनलाल आनन्द की निधि उनकी प्राणप्यारी श्रीकिशोरीजी की हा-हा खाते रहते हैं एवं उन्हें अनगिनत प्रकार से निहारते रहते हैं । श्रीललित मोहिनीजी कहती हैं कि रस-विलास के जिस सुख में ये दोनों आठों याम (निरन्तर) विहार करते रहते हैं, वही हमारा पूर्ण सुख है । [2]