जा सुख नैना सुख ढके, सो सुख कह्यो न जाइ ।
विरह पीर जासौं मिटै, सो सुख साँचो ठहराइ ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (7)
जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है । सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।
विरह पीर जासौं मिटै, सो सुख साँचो ठहराइ ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (7)
जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है । सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।

