काली कहै मो मैं है रु - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (23)

काली कहै मो मैं है रु - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (23)

(कवित्त)
काली कहै मो मैं है रु सिव कहै मो मैं है रु,
ब्रह्मा कहै मो मैं जाको थाह ना परत है। [1]
इंद्र कहै मो मैं है बरुन कहै मो मैं है रु,
कहत कुबेर नित ध्यान कौ धरत है॥ [2]
जम कहै मो मैं है रु सेस कहै मो मैं है रु,
ब्रजनिधि सबहू कृपालना करत है। [3]
तीन लोक को ही नाथ ताके सब विस्व हाथ,
सो तौ ब्रजरानी पग जावक भरत है॥ [4]

- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (23)

जिनका पार माता काली, भगवान शिव एवं ब्रह्मा भी पाने में असमर्थ हैं। [1]

जिनकी भक्ति इंद्र, वरुण एवं कुबेर आदि देवता करते रहते हैं। [2]

यमराज, शेषनाग आदि देव भी जिन पर आश्रित होकर, सदा जिनकी कृपा पाने की याचना करते रहते हैं। [3]

वे श्री कृष्ण, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं और जिनके आधीन सारा संसार है, वे ब्रजरानी श्री राधिका महारानी के चरणों में जावक लगाकर, उनके श्री चरणों की सेवा करते हैं। [4]