(राग दरबारी व बरवा)
किशोरी ! दे वृन्दावन बास ।
रसिकन के चरणन में प्रीति, यह राखूँ उर आस ॥ [1]
तुमरो नाम रटूँ निशिवासर, बढ़े दरश की प्यास ।
सेवा हित चित रहे निरन्तर, मन मं उमंग हुलास ॥ [2]
रहे दीनता भाव सबन सों, होय मोह मद नास ।
“रूपमाधुरी” की यह विनती, सुनो प्रिया सुखरास ॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (102)
हे किशोरी जी (श्री राधा)! मुझे वृंदावन का सदा वास प्रदान कीजिए! मेरी यही आशा है कि रसिक संतों के चरणों में मेरी प्रीति सदा बनी रहे । [1]
रात-दिन मैं आपका नाम रटता रहूँ, आपके दर्शन की प्यास पल-पल बढ़ती रहे। मेरा मन सदा आपकी सेवा में लगा रहे, आनंद और उल्लास से भरा रहे। [2]
मैं सदा सब के प्रति विनम्रता बनाए रखूं एवं मोह मद आदि का विनाश हो । यह “रूपमाधुरी” की प्रार्थना है, कृपया इसे सुनें, हे आनंद की मूर्ति, श्री राधा! [3]
किशोरी ! दे वृन्दावन बास ।
रसिकन के चरणन में प्रीति, यह राखूँ उर आस ॥ [1]
तुमरो नाम रटूँ निशिवासर, बढ़े दरश की प्यास ।
सेवा हित चित रहे निरन्तर, मन मं उमंग हुलास ॥ [2]
रहे दीनता भाव सबन सों, होय मोह मद नास ।
“रूपमाधुरी” की यह विनती, सुनो प्रिया सुखरास ॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (102)
हे किशोरी जी (श्री राधा)! मुझे वृंदावन का सदा वास प्रदान कीजिए! मेरी यही आशा है कि रसिक संतों के चरणों में मेरी प्रीति सदा बनी रहे । [1]
रात-दिन मैं आपका नाम रटता रहूँ, आपके दर्शन की प्यास पल-पल बढ़ती रहे। मेरा मन सदा आपकी सेवा में लगा रहे, आनंद और उल्लास से भरा रहे। [2]
मैं सदा सब के प्रति विनम्रता बनाए रखूं एवं मोह मद आदि का विनाश हो । यह “रूपमाधुरी” की प्रार्थना है, कृपया इसे सुनें, हे आनंद की मूर्ति, श्री राधा! [3]

