प्रीति तौ मरिबौऊ न विचारै - श्री सूरदास, सूर सागर

प्रीति तौ मरिबौऊ न विचारै - श्री सूरदास, सूर सागर

प्रीति तौ मरिबौऊ न विचारै ।
निरखि पतंग ज्योति पावक ज्यौं, जरत न आपु संभारै ॥ [1]
प्रीति कुरंग नाद मन मोहित, बधिक निकट ह्वै मारै ।
प्रीति परेवा उड़त गगन तैं, गिरत न आपु संभारै॥ [2]
सावन मास पपीहा बोलत, पिय, पिय करि जु पुकारै।
सूरदास प्रभु दरसन कारन, ऐसी भाँति बिचारै ॥ [3]

- श्री सूरदास, सूर सागर

प्रेम मृत्यु की परवाह नहीं करता, जैसे दीपक को देखकर पतंगा बिना सोचे-समझे जल जाता है। [1]

जैसे ध्वनि से मोहित होकर हिरण शिकारी के पास पहुँच कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । उसी प्रकार एक कबूतर जो गगन में ऊँचाई पर उड़ना पसंद करता है, फिर अपने आप को सम्भाल नहीं पाता और गिर जाता है । [2]

सावन के महीने में, पपीहा पक्षी स्वाति बूँदों की लालसा में “पिय पिय” पुकारता रहता है। श्री सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु के दर्शन के लिए वो भी इसी प्रकार का विचार रखते हैं । [3]