भक्त-पद-धूलि आर भक्त-पद-जल । भक्त-भुक्त-अवशेष–तीन महाबल ॥
एइ तीन सेवा हैते कृष्ण प्रेम हय । पुनः पुनः सर्व शास्त्रे पुकारिया कय ॥
- चैतन्य-चरितामृत, अंत्य: लीला (16.61-16.62)
भक्तों के चरणों की धूल, भक्तों के चरणों का प्रक्षालित जल तथा भक्तों का उच्छिष्ट (उनके द्वारा छोड़ा गया शेष भोजन) – ये तीन वस्तुएं भक्ति में आगे बढ़ने के लिए महान बल हैं । इन तीनों के सेवन से मनुष्य को कृष्ण प्रेम का परम लक्ष्य प्राप्त होता है । सारे प्रमाणिक शास्त्रों में बारम्बार पुकार पुकार कर इसकी घोषणा की गई है ।
एइ तीन सेवा हैते कृष्ण प्रेम हय । पुनः पुनः सर्व शास्त्रे पुकारिया कय ॥
- चैतन्य-चरितामृत, अंत्य: लीला (16.61-16.62)
भक्तों के चरणों की धूल, भक्तों के चरणों का प्रक्षालित जल तथा भक्तों का उच्छिष्ट (उनके द्वारा छोड़ा गया शेष भोजन) – ये तीन वस्तुएं भक्ति में आगे बढ़ने के लिए महान बल हैं । इन तीनों के सेवन से मनुष्य को कृष्ण प्रेम का परम लक्ष्य प्राप्त होता है । सारे प्रमाणिक शास्त्रों में बारम्बार पुकार पुकार कर इसकी घोषणा की गई है ।

