श्रीस्वामिनी जू के चरन पलोटत - श्री अनुराग सखी जी

श्रीस्वामिनी जू के चरन पलोटत - श्री अनुराग सखी जी

(सवैया)
श्रीस्वामिनी जू के चरन पलोटत, तन मन धन सब वारुंगी। [1]
कबहुँ लगाय अपने हिये सों, नैनन सों जल ढारूँगी॥ [2]
श्री रुपमंजरी करकमलन चापैं, सो छवि नैन निहारुंगी। [3]
‘अनुराग’ सखी बरसाने वारी, कब ये सुखहि सम्हारुंगी॥ [4]

- श्री अनुराग सखी जी

श्री स्वामिनीजू (श्री राधा) के चरणों को दबाते हुए, मैं तन, मन, धन सब न्यौछावर कर दूँगी। [1]

कभी उन श्री चरणों को अपने हृदय से लगाकर, प्रेम में भरकर आँसू बहाऊँगी। [2]

जिन श्री चरणों की सेवा श्री रूप मंजरी करती हैं, उन श्री चरणों की छवि का दर्शन पाकर कृतार्थ हो जाऊँगी। [3]

बरसाने वाली श्री अनुराग सखी जी कहती हैं कि ऐसा कब होगा कि मैं इस रस का पान करूँगी। [4]