कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ, प्रेम-सुधा-रस पाय ।
जिमि सनकादि शुकादि मन, ब्रज-रस रहे डुबाय ॥

- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है । जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये ।