रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक ।
जारत तृन अभिमान अविद्या, मनहुँ अग्नि के ऊक ॥ [1]
काजहि काज कहा करकच सों, रह्यौ मौन ह्वै मूक ।
श्रीबिहारीदास हरिदास दई बुद्धि, गई हिये की हूक ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (142)
अब हमें इन ब्रजबासियों के ही घर-घर के टूक रुचते हैं, जो अभिमान अविद्या रूपी तृण के लिए मानो साक्षात अग्नि की ज्वाला स्वरूप हैं । [1]
अब हमें किसी करकच से कोई काम नहीं है अत: हम सदा काल सब से मौन ही रहते हैं । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने कृपा करके ऐसी बुद्धि एवं तत्वज्ञान दिया है जिससे हमारे ह्रदय की समस्त वासनाएँ स्वतः ही नष्ट हो गई हैं । [2]
जारत तृन अभिमान अविद्या, मनहुँ अग्नि के ऊक ॥ [1]
काजहि काज कहा करकच सों, रह्यौ मौन ह्वै मूक ।
श्रीबिहारीदास हरिदास दई बुद्धि, गई हिये की हूक ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (142)
अब हमें इन ब्रजबासियों के ही घर-घर के टूक रुचते हैं, जो अभिमान अविद्या रूपी तृण के लिए मानो साक्षात अग्नि की ज्वाला स्वरूप हैं । [1]
अब हमें किसी करकच से कोई काम नहीं है अत: हम सदा काल सब से मौन ही रहते हैं । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने कृपा करके ऐसी बुद्धि एवं तत्वज्ञान दिया है जिससे हमारे ह्रदय की समस्त वासनाएँ स्वतः ही नष्ट हो गई हैं । [2]

