(कुण्डलिया)
जाकी दृगन कटाक्ष सर, विंध्यो नन्दसुत-वीर ।
मूर्छित ह्वै अवनी लुठत, पुनि-पुनि विकल अधीर ॥ [1]
पुनि-पुनि विकल अधीर, निपट कसरत उर अंतर ।
वंशी कहुँ खस परी गिरयौ, कहुँ मुकुट मोर पर ॥ [2]
विगलित पीत दुकूल, सुरति नहिं नेंकहु ताकी ।
कब मैं रसजुत करहुँ, हरषि परिचरिया जाकी ॥ [3]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (38)
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री कृष्ण मूर्छित होकर धरती पर गिर जाते हैं और पुनः-पुनः व्याकुल और अधीर हो उठते हैं। [1]
उनके हृदय में ऐसा भावावेश उत्पन्न होता है जिसके कारण उनकी मुरली हाथ से छूटकर गिर जाती है और सिर का मोर मुकुट खिसक जाता है। [2]
उनका पीतांबर अस्त-व्यस्त हो जाता है; उन्हें एक क्षण की भी सुधि नहीं रहती। ऐसे नयनों से बाण चलाने वाली श्री राधा महारानी की मैं दासी बनकर, प्रेम-सुधा में उन्मत्त होकर, कब उनकी सेवा करूँगी? [3]
जाकी दृगन कटाक्ष सर, विंध्यो नन्दसुत-वीर ।
मूर्छित ह्वै अवनी लुठत, पुनि-पुनि विकल अधीर ॥ [1]
पुनि-पुनि विकल अधीर, निपट कसरत उर अंतर ।
वंशी कहुँ खस परी गिरयौ, कहुँ मुकुट मोर पर ॥ [2]
विगलित पीत दुकूल, सुरति नहिं नेंकहु ताकी ।
कब मैं रसजुत करहुँ, हरषि परिचरिया जाकी ॥ [3]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (38)
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री कृष्ण मूर्छित होकर धरती पर गिर जाते हैं और पुनः-पुनः व्याकुल और अधीर हो उठते हैं। [1]
उनके हृदय में ऐसा भावावेश उत्पन्न होता है जिसके कारण उनकी मुरली हाथ से छूटकर गिर जाती है और सिर का मोर मुकुट खिसक जाता है। [2]
उनका पीतांबर अस्त-व्यस्त हो जाता है; उन्हें एक क्षण की भी सुधि नहीं रहती। ऐसे नयनों से बाण चलाने वाली श्री राधा महारानी की मैं दासी बनकर, प्रेम-सुधा में उन्मत्त होकर, कब उनकी सेवा करूँगी? [3]

