सदा बसै वृन्दाबिपिन, तजे न कबहूँ खेत ।
लाड लडावै जुगल वर, लियें प्रिया कौ हेत ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (412)
जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (श्री राधा) से अनन्य प्रेम संबंध स्थापित कर, श्री जुगल को मनमानी लाड़-लड़ाते हैं ।
लाड लडावै जुगल वर, लियें प्रिया कौ हेत ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (412)
जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (श्री राधा) से अनन्य प्रेम संबंध स्थापित कर, श्री जुगल को मनमानी लाड़-लड़ाते हैं ।

