अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

(कवित्त)
अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में,
लाज गुरु लोगन की खो गई सुखो गई। [1]
ननद जिठानी सतरानी इतरानी रहीं,
सासु कटु॒ बात कहे सो गई सु सो गई॥ [2]
भनें बलबीर हम नीति ना अनीत जानें,
प्रेम रूपी बेलि यह बो गई सु बो गई। [3]
सामरी सलौनी छबि कैसें के बिसारी जाय,
दासी मन मोहन की हो गई सु हो गई॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं। [1]

मेरी ननद, जेठानी, सतरानी आदि मुझसे ऐंठी रहती हैं और सास भी कटु वचन बोलती है, लेकिन अब चाहे वे जो भी कहें, मुझे कोई चिंता नहीं। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं, अब मैं न तो कोई नीति जानती हूँ और न अनीति। मेरे हृदय में प्रेम रूपी बेली बो चुकी है, जो अब अडिग है। [3]

श्री कृष्ण की सांवली सलोनी छवि को मैं कैसे हृदय से बिसार सकती हूँ? अब मैं उनकी दासी हो चुकी हूँ और यह ही अटल सत्य है। [4]